संस्पर्शसुखोपचीयमाने
सर्वाङ्गे करतललग्नवल्लभायाः ।
कौशेयं व्रजदपि गाढतामजस्रं
सस्रंसे विगलितनीवि नीरजाक्ष्याः ॥
संस्पर्शसुखोपचीयमाने
सर्वाङ्गे करतललग्नवल्लभायाः ।
कौशेयं व्रजदपि गाढतामजस्रं
सस्रंसे विगलितनीवि नीरजाक्ष्याः ॥
सर्वाङ्गे करतललग्नवल्लभायाः ।
कौशेयं व्रजदपि गाढतामजस्रं
सस्रंसे विगलितनीवि नीरजाक्ष्याः ॥
मल्लिनाथः
संस्पर्शेति ॥ करतले लग्नो वल्लभो यस्यास्तस्याः । स्वहस्तेन तद्धस्तं गृहीत्वा&#३२; गच्छन्त्या इत्यर्थः । अत एव नीरजाक्ष्याः सर्वाङ्गे संस्पर्शप्रभवेन प्रियाङ्गसंगप्रभवेन सुखेनोपचीयमाने पोषं गमिते सति । अत एव गाढतां दृढत्वं व्रजदपि विगलितनीवि सुखपारवश्याद्विश्लिष्टग्रन्थि कौशेयं दुकूलमजस्रं सस्रंसे स्वस्तम् । एषा हृष्टा हर्षितरोमा च
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | स्प | र्श | सु | खो | प | ची | य | मा | ने | |||
| स | र्वा | ङ्गे | क | र | त | ल | ल | ग्न | व | ल्ल | भा | याः |
| कौ | शे | यं | व्र | ज | द | पि | गा | ढ | ता | म | ज | स्रं |
| स | स्रं | से | वि | ग | लि | त | नी | वि | नी | र | जा | क्ष्याः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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