सौगन्धं दधदपि काममङ्गनानां
दूरत्वाद्गतमाननोपमानम् ।
नेदीयो जितमिति लज्जयेव तासा-
मालोले पयसि मनोत्पलं ममज्ज ॥
सौगन्धं दधदपि काममङ्गनानां
दूरत्वाद्गतमाननोपमानम् ।
नेदीयो जितमिति लज्जयेव तासा-
मालोले पयसि मनोत्पलं ममज्ज ॥
दूरत्वाद्गतमाननोपमानम् ।
नेदीयो जितमिति लज्जयेव तासा-
मालोले पयसि मनोत्पलं ममज्ज ॥
मल्लिनाथः
सौगन्ध्यमिति ॥ कामं पर्याप्तं सौगन्ध्यं सुरभिगन्धित्वं संबन्धित्वं च । `गन्धो गन्धक आमोदे लेशे संबन्धिगर्वयोः` इति विश्वः । दधदपि अहं दूरत्वात् पूर्वं दूरस्थत्वादङ्गनानामाननोपमानं मुखसादृश्यं गतम् । `दूरस्थाः पर्वता रम्याः` इतिवदिति भावः । संप्रति पुनस्तासां नेदीयो नेदिष्ठमन्तिकतमं सत् । `अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ` (अष्टाध्यायी ५.३.६३ ) इत्यन्तिकशब्दस्य नेदादेशः । जितं परिभूतमभूवमिति लज्जयेव महोत्पलमरविन्दम् आलोले चले पयसि ममज्ज । यथा `दूरे साम्येन दृश्यमानः संबन्धी संनिधाववमानितः क्वचिल्लज्जया निलीयते तद्वदिति । अत्र पयश्चलनकृतेऽब्जमज्जने लज्जाहेतुकत्वमुत्प्रेक्ष्यत इति श्लेषमूलातिशयोक्तिहेतूत्प्रेक्षयोः संसृष्टिः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सौ | ग | न्धं | द | ध | द | पि | का | म | म | ङ्ग | ना | नां |
| दू | र | त्वा | द्ग | त | मा | न | नो | प | मा | नम् | ||
| ने | दी | यो | जि | त | मि | ति | ल | ज्ज | ये | व | ता | सा |
| मा | लो | ले | प | य | सि | म | नो | त्प | लं | म | म | ज्ज |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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