किं तावत्सरसि सरोजमेतदाहो-
स्विन्मुखमवभासते युवत्याः ।
संशय्य क्षणमिति निश्चिकाय कश्चि-
द्विव्योकैर्बकसहवासिनां परोक्षैः ॥
किं तावत्सरसि सरोजमेतदाहो-
स्विन्मुखमवभासते युवत्याः ।
संशय्य क्षणमिति निश्चिकाय कश्चि-
द्विव्योकैर्बकसहवासिनां परोक्षैः ॥
स्विन्मुखमवभासते युवत्याः ।
संशय्य क्षणमिति निश्चिकाय कश्चि-
द्विव्योकैर्बकसहवासिनां परोक्षैः ॥
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | ता | व | त्स | र | सि | स | रो | ज | मे | त | दा | हो |
| स्वि | न्मु | ख | म | व | भा | स | ते | यु | व | त्याः | ||
| सं | श | य्य | क्ष | ण | मि | ति | नि | श्चि | का | य | क | श्चि |
| द्वि | व्यो | कै | र्ब | क | स | ह | वा | सि | नां | प | रो | क्षैः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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