आलापैस्तुलितरवाणि माधवीनां
माधुर्यादमलपतत्रिणां कुलानि ।
अन्तर्धामुपययुरुत्पलावलीषु
प्रादुष्कात्क इव जितः पुरः परेण ॥
आलापैस्तुलितरवाणि माधवीनां
माधुर्यादमलपतत्रिणां कुलानि ।
अन्तर्धामुपययुरुत्पलावलीषु
प्रादुष्कात्क इव जितः पुरः परेण ॥
माधुर्यादमलपतत्रिणां कुलानि ।
अन्तर्धामुपययुरुत्पलावलीषु
प्रादुष्कात्क इव जितः पुरः परेण ॥
मल्लिनाथः
आलापैरिति ॥ माधवीनां हरिवधूनामालापैः कर्तृभिः माधुर्याद्धेतोस्तुलितरवाणि तिरस्कृतरुतानि अमलपतत्रिणां हंसानां कुलानि उत्पलावलीष्वन्तर्धानम् । `अन्तःशब्दस्याङ्किविधिणत्वेषूपसर्गत्वं वाच्यम्` (वा०) इति अन्तःशब्दस्योपसर्गत्वात् `आतश्चोपसर्गे (अष्टाध्यायी ३.३.१०६ ) इत्यङ् प्रत्ययः । उपययुः । युक्तं चैतदित्याह-तथाहि । परेण जितः कः । इवशब्दो वाक्यालंकारे । पुरो जेतुरग्रे प्रादुःष्यात् प्रादुर्भवेत् । `उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः` (अष्टाध्यायी ८.३.८७ ) इति षत्वम् । अर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ला | पै | स्तु | लि | त | र | वा | णि | मा | ध | वी | नां |
| मा | धु | र्या | द | म | ल | प | त | त्रि | णां | कु | ला | नि |
| अ | न्त | र्धा | मु | प | य | यु | रु | त्प | ला | व | ली | षु |
| प्रा | दु | ष्का | त्क | इ | व | जि | तः | पु | रः | प | रे | ण |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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