आध्राय श्रमजमनिन्द्यबन्धुं
निश्वासश्वसनमसक्तमङ्गनानाम् ।
आरण्याः सुमनस ईषिरे न भृङ्गै-
रौचित्यं गणयति को विशेषकामः ॥
आध्राय श्रमजमनिन्द्यबन्धुं
निश्वासश्वसनमसक्तमङ्गनानाम् ।
आरण्याः सुमनस ईषिरे न भृङ्गै-
रौचित्यं गणयति को विशेषकामः ॥
निश्वासश्वसनमसक्तमङ्गनानाम् ।
आरण्याः सुमनस ईषिरे न भृङ्गै-
रौचित्यं गणयति को विशेषकामः ॥
मल्लिनाथः
आघ्रायेति ॥ भृङ्गैः कर्तृभिः श्रमजमध्वश्रमोत्थम् । अनिन्द्यगन्धस्य श्लाघ्यगन्धस्य बन्धुं सहचरम् । तद्वन्तमित्यर्थः । अङ्गनानां निश्वासश्वसनं निश्वासमारुतम् । असक्तमप्रतिषिद्धमाघ्राय अरण्ये भवा आरण्याः सुमनसः पुष्पाणि नेषिरे नेष्टाः । `इषु इच्छायाम्` कर्मणि लिट् । अनुचितोऽयमकाण्डे परिचितपरित्याग इत्याह । विशेषं कामयते इति विशेषकामः । `शीलिकामिभक्ष्याचरिभ्यो णः` (वा०) इति णप्रत्ययः । क औचित्यं गणयति । न कोऽपीत्यर्थः । अर्थान्तरन्यासः
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ध्रा | य | श्र | म | ज | म | नि | न्द्य | ब | न्धुं | ||
| नि | श्वा | स | श्व | स | न | म | स | क्त | म | ङ्ग | ना | नाम् |
| आ | र | ण्याः | सु | म | न | स | ई | षि | रे | न | भृ | ङ्गै |
| रौ | चि | त्यं | ग | ण | य | ति | को | वि | शे | ष | का | मः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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