अभिमतमभितः कृताङ्गभङ्गा
कुचयुगमुन्नतिवित्तमुन्नमय्य ।
तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन
व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥
अभिमतमभितः कृताङ्गभङ्गा
कुचयुगमुन्नतिवित्तमुन्नमय्य ।
तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन
व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥
कुचयुगमुन्नतिवित्तमुन्नमय्य ।
तनुरभिलषितं क्लमच्छलेन
व्यवृणुत वेल्लितबाहुवल्लरीका ॥
मल्लिनाथः
अभिमतमिति ॥ तनुः काचित्तन्वी । `वोतो गुणवचनात्` (अष्टाध्यायी ४.१.४४ ) इति विकल्पादनीकारः । अभिमतमभितः। प्रियमभीत्यर्थः । उन्नतिवित्तं औन्नत्येन प्रतीतम् । विदेर्भावार्थात् `वित्तो भोगप्रत्यययोः` (अष्टाध्यायी ८.२.५८ ) इति प्रत्ययार्थे निष्ठानत्वाभावनिपातः । कुचयुगमुन्नमय्योत्तुङ्गीकृत्य कृतोऽङ्गभङ्गो गात्रविजृम्भणं यया सा । तथा वेल्लिते मिथोवेष्टिते बाहुवल्लर्यौ भुजलते यया सा । `नद्यृतश्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१५३ ) इति कप् । क्लमच्छलेन । श्रमापनोदकचेष्टाव्याजेनेत्यर्थः । अभिलषितमालिङ्गनाद्यभिलषितं व्यवृणुत प्रकटितवती । वृणोतेर्लङ् । प्रौढेयमुत्सुका च
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | म | त | म | भि | तः | कृ | ता | ङ्ग | भ | ङ्गा | |
| कु | च | यु | ग | मु | न्न | ति | वि | त्त | मु | न्न | म | य्य |
| त | नु | र | भि | ल | षि | तं | क्ल | म | च्छ | ले | न | |
| व्य | वृ | णु | त | वे | ल्लि | त | बा | हु | व | ल्ल | री | का |
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