विपुलकमपि यौवनोद्धतानां
घनपुलकोदयकोमलं चकाशे ।
परिमलितमपि प्रियैः प्रकामं
कुचयुगमुज्ज्वलमेष कामिनीनाम् ॥
विपुलकमपि यौवनोद्धतानां
घनपुलकोदयकोमलं चकाशे ।
परिमलितमपि प्रियैः प्रकामं
कुचयुगमुज्ज्वलमेष कामिनीनाम् ॥
घनपुलकोदयकोमलं चकाशे ।
परिमलितमपि प्रियैः प्रकामं
कुचयुगमुज्ज्वलमेष कामिनीनाम् ॥
मल्लिनाथः
विपुलकमिति ॥ यौवनोद्धतानां कामिनीनां कुचयुगं विपुलकं पुलकरहित मपि घनपुलकोदयेन सान्द्ररोमोद्गमेन कोमलं सदिति विरोधः । विपुलं विस्तृतं तदेव विपुलकमित्यविरोधः । प्रियैः प्रकामं परितो मलमस्येति परिमलं तत्कृतं परिमलितं मलिनीकृतं तथाप्युज्ज्वलं विमलमेव चकाश इति विरोधः । परिमलवत्कृतं परिमलितमित्यविरोधः । मत्वन्तात् `तत्करोति-` (ग०) इति णिचि कर्मणि क्तः । णाविष्ठवद्भावे विन्मतोर्लुक् । अपिर्विरोधे । विरोधाभासालंकारयोः संसृष्टिः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | पु | ल | क | म | पि | यौ | व | नो | द्ध | ता | नां | |
| घ | न | पु | ल | को | द | य | को | म | लं | च | का | शे |
| प | रि | म | लि | त | म | पि | प्रि | यैः | प्र | का | मं | |
| कु | च | यु | ग | मु | ज्ज्व | ल | मे | ष | का | मि | नी | नाम् |
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