स्मरसरसमुरःस्थलेन पत्यु-
र्विनिमयसंक्रमिताङ्गरागरागैः ।
भृशमतिशयखेदसम्पदेव
स्तनयुगलैरितरेतरं निषण्णैः ॥
स्मरसरसमुरःस्थलेन पत्यु-
र्विनिमयसंक्रमिताङ्गरागरागैः ।
भृशमतिशयखेदसम्पदेव
स्तनयुगलैरितरेतरं निषण्णैः ॥
र्विनिमयसंक्रमिताङ्गरागरागैः ।
भृशमतिशयखेदसम्पदेव
स्तनयुगलैरितरेतरं निषण्णैः ॥
मल्लिनाथः
स्मरेति ॥ पुनः स्मरेण सरसं सानुरागं यथा तथा पत्युरुरःस्थलेन कर्त्रा विनिमयेन व्यतिहारेण संक्रमितोऽङ्गरागोऽनुलेपनं तेन रागो रञ्जनं येषु तैः अतिशयोऽतिशयितो यः खेदस्तस्य संपदा महिम्नेवेत्युत्प्रेक्षा । भृशमितरेतरं निषण्णैः परस्परं संश्रितैः स्तनयुगलैः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्म | र | स | र | स | मु | रः | स्थ | ले | न | प | त्यु | |
| र्वि | नि | म | य | सं | क्र | मि | ता | ङ्ग | रा | ग | रा | गैः |
| भृ | श | म | ति | श | य | खे | द | स | म्प | दे | व | |
| स्त | न | यु | ग | लै | रि | त | रे | त | रं | नि | ष | ण्णैः |
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