इदमिदमिति भूरुहां प्रसूनै-
र्मुहुरतिलोभयता पुरःपुरोऽन्या ।
अनुरहसमनायि नायकेन
त्वरयति रन्तुमहो जनं मनोभूः ॥
इदमिदमिति भूरुहां प्रसूनै-
र्मुहुरतिलोभयता पुरःपुरोऽन्या ।
अनुरहसमनायि नायकेन
त्वरयति रन्तुमहो जनं मनोभूः ॥
र्मुहुरतिलोभयता पुरःपुरोऽन्या ।
अनुरहसमनायि नायकेन
त्वरयति रन्तुमहो जनं मनोभूः ॥
मल्लिनाथः
इदमिदमिति ॥ अन्या स्त्री इदमिदमिति । इदं ग्राह्यमिदं ग्राह्यमित्युक्त्वेत्यर्थः । भूरुहां वृक्षाणां प्रसूनैः पुष्पैः पुरःपुरो मुहुरतिलोभयता प्रलोभयता नायकेन रहोऽनु अनुरहसमेकान्तम् । `अन्ववतप्तात्-` (अष्टाध्यायी ५.४.८१ ) इत्यव्ययीभावः समासान्तः । अनायि नीता । तथा हि—मनोभूः कामो जनं रन्तुं त्वरयति । देशकालानपेक्षयेति भावः । अत एवाश्चर्यमहो इति । पूर्ववन्नायिकानायकविवेकः । अर्थान्तरन्यासः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | द | मि | द | मि | ति | भू | रु | हां | प्र | सू | नै | |
| र्मु | हु | र | ति | लो | भ | य | ता | पु | रः | पु | रो | ऽन्या |
| अ | नु | र | ह | स | म | ना | यि | ना | य | के | न | |
| त्व | र | य | ति | र | न्तु | म | हो | ज | नं | म | नो | भूः |
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