कृतकृतकरुषा सखीमपास्य
त्वमकुशलेति कयाचिदात्मनैव ।
अभिमतमभि साभिलाषमावि-
ष्कृतभुजमूलमबन्धि मूर्ध्नि माला ॥
कृतकृतकरुषा सखीमपास्य
त्वमकुशलेति कयाचिदात्मनैव ।
अभिमतमभि साभिलाषमावि-
ष्कृतभुजमूलमबन्धि मूर्ध्नि माला ॥
त्वमकुशलेति कयाचिदात्मनैव ।
अभिमतमभि साभिलाषमावि-
ष्कृतभुजमूलमबन्धि मूर्ध्नि माला ॥
मल्लिनाथः
कृतेति ॥ कृतकृतकरुषा कृतकृत्रिमरोषया कयाचिन्नायिकया त्वमकुशला माल्यग्रथने कुशला नासीति सखीमपास्य निरस्यात्मना स्वयमेवाभिमतमभिप्रायाभिमुखं साभिलाषमाविष्कृतभुजमूलं प्रकाशितकक्षप्रदेशं यथा तथा मूर्ध्नि माला अबन्धि बद्धा । अयं च स्वाभिप्रायव्यञ्जकचेष्टारूपश्चापलाख्यः संचारिविशेषः । नायिका प्रौढैव । `स्मरमन्दीकृतव्रीडा प्रौढा संपूर्णयौवना` इति लक्षणात्
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | त | कृ | त | क | रु | षा | स | खी | म | पा | स्य | |
| त्व | म | कु | श | ले | ति | क | या | चि | दा | त्म | नै | व |
| अ | भि | म | त | म | भि | सा | भि | ला | ष | मा | वि | |
| ष्कृ | त | भु | ज | मू | ल | म | ब | न्धि | मू | र्ध्नि | मा | ला |
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