मल्लिनाथः
अनुवपुरिति ॥ अन्या स्त्री वपुषः पश्चादनुवपुः स्त्रीपृष्ठभागः । `अव्ययं विभक्ति-` (२/१/६) इत्यादिना पश्चादर्थेऽव्ययीभावः । बाहुमूलयोः स्त्रीकक्षयोः प्रहितावधःप्रसारितौ भुजौ ताभ्यामाकलितस्तनेन गृहीतस्तनेन कपोले निहितदशनवाससा न्यस्ताधरेण किंचिदावृतमुख्याः सत्याः कपोलं चुम्बतेत्यर्थः । अपरेण कामिना विषमं प्रियाङ्गिसंघर्षात् श्लिष्टं वितीर्णपदं न्यस्ताङ्घ्रि यथा तथा बलादिव निन्ये नीता। आरोप्य नीयमानेव गमयांचक्र इत्यर्थः । एषा पुरोगामिनी
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नु | व | पु | र | प | रे | ण | बा | हु | मू | ल | |
| प्र | हि | त | भु | जा | क | लि | त | स्त | ने | न | नि | न्ये |
| नि | हि | त | द | श | न | वा | स | सा | क | पो | ले | |
| वि | ष | म | वि | ती | र्ण | प | दं | ब | ला | दि | वा | न्या |
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