मुहुरसुसममाध्नती नितान्तं
प्रणदितकाञ्चि नितम्बमण्डलेन ।
विषमितपृथुहारयष्टि तिर्य-
क्कुचमितरं तदुरस्थले निपीड्य ॥
मुहुरसुसममाध्नती नितान्तं
प्रणदितकाञ्चि नितम्बमण्डलेन ।
विषमितपृथुहारयष्टि तिर्य-
क्कुचमितरं तदुरस्थले निपीड्य ॥
प्रणदितकाञ्चि नितम्बमण्डलेन ।
विषमितपृथुहारयष्टि तिर्य-
क्कुचमितरं तदुरस्थले निपीड्य ॥
मल्लिनाथः
मुहुरिति ॥ पुनः किं कृत्वा । नितम्बमण्डलेन करणेन नितान्तमतिशयेन प्रणदिता प्रकर्षेण नदन्ती काञ्ची यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा । `उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य` (८४१४) इति णत्वम् । मुहुरसुसमं प्राणेशमाघ्नती ताडयन्ती। हन्तेराङ्पूर्वाल्लटः शत्रादेशे ङीप् । सकर्मकत्वान्न `आङो यमहनः` (१॥३॥२८) इत्यात्मनेपदम् । विषमिता विषमीकृता पृथुहारयष्टिर्यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा इतरं पूर्वश्लोकोक्तबहिःस्तनादन्यम् । दक्षिणमित्यर्थः । कुचं तस्य भर्तुरुरःस्थले तिर्यङ् निपीड्य । पूर्ववत्संबन्धः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | हु | र | सु | स | म | मा | ध्न | ती | नि | ता | न्तं | |
| प्र | ण | दि | त | का | ञ्चि | नि | त | म्ब | म | ण्ड | ले | न |
| वि | ष | मि | त | पृ | थु | हा | र | य | ष्टि | ति | र्य | |
| क्कु | च | मि | त | रं | त | दु | र | स्थ | ले | नि | पी | ड्य |
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