अशिथिलमपरावसज्य कण्ठे
दृढपरिरब्धबृहद्बहिस्तनेन ।
हृषिततनुरुहा भुजेन भर्तृ-
र्मृदुममृदु व्यतिविद्धमेकबाहुं ॥
अशिथिलमपरावसज्य कण्ठे
दृढपरिरब्धबृहद्बहिस्तनेन ।
हृषिततनुरुहा भुजेन भर्तृ-
र्मृदुममृदु व्यतिविद्धमेकबाहुं ॥
दृढपरिरब्धबृहद्बहिस्तनेन ।
हृषिततनुरुहा भुजेन भर्तृ-
र्मृदुममृदु व्यतिविद्धमेकबाहुं ॥
मल्लिनाथः
अशिथिलमित्यादि ॥ अपरा स्त्री दृढं परिरब्धो गृहीतो बृहद्वहिःस्तनो येन तेन हृषितान्युदञ्चितानि तनुरूहि रोमाणि यस्य तेन । पुलकितेनेत्यर्थः । क्विबन्तोत्तरपदो बहुव्रीहिः । `हृषेर्लोमसु` (अष्टाध्यायी ७.२.२९ ) इतीडागमः । भुजेन भर्तुर्वामबाहुना अमृदु गाढं यथा तथा व्यतिविद्धं व्यतिषञ्जितं मृदुं कोमलमेकबाहुं निजदक्षिणबाहुं भर्तुः कण्ठेऽशिथिलं दृढमवसज्यासज्य जगामेति भाविना संबध्यते
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | शि | थि | ल | म | प | रा | व | स | ज्य | क | ण्ठे | |
| दृ | ढ | प | रि | र | ब्ध | बृ | ह | द्ब | हि | स्त | ने | न |
| हृ | षि | त | त | नु | रु | हा | भु | जे | न | भ | र्तृ | |
| र्मृ | दु | म | मृ | दु | व्य | ति | वि | द्ध | मे | क | बा | हुं |
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