प्रियसखीसदृशं प्रतिबोधिताः
किमपि काम्यगिरा परपुष्टया ।
प्रियतमाय वपुर्गुरुमत्सर-
च्छिदुरयादुरनाचिंअङ्गनाः ॥
प्रियसखीसदृशं प्रतिबोधिताः
किमपि काम्यगिरा परपुष्टया ।
प्रियतमाय वपुर्गुरुमत्सर-
च्छिदुरयादुरनाचिंअङ्गनाः ॥
किमपि काम्यगिरा परपुष्टया ।
प्रियतमाय वपुर्गुरुमत्सर-
च्छिदुरयादुरनाचिंअङ्गनाः ॥
मल्लिनाथः
प्रियसखीति ॥ गुरोर्महतो मत्सरस्य द्वेषस्य छिदुरया छेञ्न्या । `विदिभिदिच्छिदेः कुरच्` (अष्टाध्यायी ३.२.१६२ ) । काम्यगिरा ग्राह्यवाचा परपुष्टया कोकिलया प्रियसख्या सदृशं यथा तथा किमपि परैर्दुर्बोधं रहस्यं हितं प्रतिबोधिता उपदिष्टा अङ्गनाः प्रियतमाय अयाचितमप्रार्थितमेव वपुर्निजाङ्गम् अदुरर्पयामासुः । ददातेर्लुङि `गातिस्था-` (२।४/७७) इत्यादिना सिचो लुक् । कोकिलाकूजितश्रवणानन्तरमेचाङ्गार्पणादौत्सुक्यहेतुकाद्यनन्तरन्यायेन तथा किमपि बोधिता इत्युत्प्रेक्षा
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रि | य | स | खी | स | दृ | शं | प्र | ति | बो | धि | ताः |
| कि | म | पि | का | म्य | गि | रा | प | र | पु | ष्ट | या |
| प्रि | य | त | मा | य | व | पु | र्गु | रु | म | त्स | र |
| च्छि | दु | र | या | दु | र | ना | चिं | अ | ङ्ग | नाः | |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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