कुटजानि वीक्ष्य शिखिभिः शिखरीन्द्रं
समयावनौ घनमदभ्रमराणि ।
गगनं च गीतनिनदस्य गिरोच्चैः
समया वनौघनमदभ्रमराणि ॥
कुटजानि वीक्ष्य शिखिभिः शिखरीन्द्रं
समयावनौ घनमदभ्रमराणि ।
गगनं च गीतनिनदस्य गिरोच्चैः
समया वनौघनमदभ्रमराणि ॥
समयावनौ घनमदभ्रमराणि ।
गगनं च गीतनिनदस्य गिरोच्चैः
समया वनौघनमदभ्रमराणि ॥
मल्लिनाथः
कुटजानीति ॥ शिखरीन्द्रं समया रैवतकाग्रे: समीपे । `अभितःपरितःसमया-` (वा०) इत्यादिना द्वितीया । अवनौ प्रदेशे घनमदा भ्रमरा येषु तानि घनमदभ्रमराणि कुटजानि कुटजकुसुमानि वनौघेन पयःपूरेण नमन्त्यभ्राणि मेघा यस्मिंस्तद्वनौघनमदभ्रम् । `पयः कीलालममृतं जीवनं भुवनं वनम्` इत्यमरः । गगनं च वीक्ष्य शिखिभिर्मयूरैर्गीतनिनदस्य गानध्वनेः समया तुल्यया । `तुल्यार्थैः-` (अष्टाध्यायी २.३.७२ ) इत्यादिना वैकल्पिकी षष्ठी । गिरा वाचा । केकयेत्यर्थः । उच्चैरराणि रणितम् । `रण शब्दे` भावे लुङ् । चिणो लुक् । कुटजा वृत्तम् । `सजसा भवेदिह सगौ कुटजाख्यम्` इति लक्षणात्
छन्दः
कलहंसम् [१३: सजससग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | ट | जा | नि | वी | क्ष्य | शि | खि | भिः | शि | ख | री | न्द्रं |
| स | म | या | व | नौ | घ | न | म | द | भ्र | म | रा | णि |
| ग | ग | नं | च | गी | त | नि | न | द | स्य | गि | रो | च्चैः |
| स | म | या | व | नौ | घ | न | म | द | भ्र | म | रा | णि |
| स | ज | स | स | ग | ||||||||
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