धृततुषारकणस्य नभस्वत-
स्तरुलताङ्गुलितर्जनविभ्रमाः ।
पृथु निरन्तरमिष्टभुजान्तरं
वनितयानितया न विषेहिरे ॥
धृततुषारकणस्य नभस्वत-
स्तरुलताङ्गुलितर्जनविभ्रमाः ।
पृथु निरन्तरमिष्टभुजान्तरं
वनितयानितया न विषेहिरे ॥
स्तरुलताङ्गुलितर्जनविभ्रमाः ।
पृथु निरन्तरमिष्टभुजान्तरं
वनितयानितया न विषेहिरे ॥
मल्लिनाथः
धृतेति ॥ धृतास्तुषारकणास्तुहिनशीकरा येन तस्य नभस्वतः पवनस्य संबन्धिनः तरुलता एवाङ्गुलयस्ताभिस्तर्जनानि यानि तान्येव विभ्रमा विलासाः पृथु विशालमिष्टस्य दयितस्य भुजान्तरं भुजमध्यं वक्षःस्थलं निरन्तरमनितया अप्रासया । गाढालिङ्गनमलभमानयेत्यर्थः । इणः कर्तरि क्तः । वनितया स्त्रिया न विषेहिरे न सोढाः । विरहिण्यस्तर्जिता इव नभस्वतो बिभ्यतीति भावः
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| धृ | त | तु | षा | र | क | ण | स्य | न | भ | स्व | त |
| स्त | रु | ल | ता | ङ्गु | लि | त | र्ज | न | वि | भ्र | माः |
| पृ | थु | नि | र | न्त | र | मि | ष्ट | भु | जा | न्त | रं |
| व | नि | त | या | नि | त | या | न | वि | षे | हि | रे |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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