मल्लिनाथः
व्रणेति ॥ मृदुतया मार्दवेन हेतुना हिममारुतैर्दुतया पीडितया । `टुदु उपतापे` इति धातोः सौवादिकात्कर्मणि क्तः । व्रणभृता दन्तव्रणवत्या सुतनोः स्त्रिया अधरो लेखेव तया अधरलेखया क &#९१; १ &#९३; र्त्र्या सुतनोः कामिन्याः कलेन सीत्कृतेन हेतुना स्फुरिताः प्रकाशिता ये दन्तमरीचयस्तन्मयं तद्रूपं स्फुटमावरणमाच्छादुनं दध इव धृतमिवेत्युत्प्रेक्षा । दधातेः कर्मणि लिद
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्र | ण | भृ | ता | सु | त | नोः | क | ल | सी | कृ | त |
| स्फु | रि | त | द | न्त | म | री | चि | म | यं | द | धे |
| स्फु | ट | मि | वा | व | र | णं | हि | मा | रु | तै | |
| र्मृ | दु | त | या | दु | त | या | ध | र | ले | ख | या |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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