न खलु दूरगतोऽप्यधिवर्तते
महमसाविति बन्धुतयोदितैः ।
प्रणयिनो निशमय्य वधूर्बहिः
स्वरमृतैरमृतैरिव निर्ववौ ॥
न खलु दूरगतोऽप्यधिवर्तते
महमसाविति बन्धुतयोदितैः ।
प्रणयिनो निशमय्य वधूर्बहिः
स्वरमृतैरमृतैरिव निर्ववौ ॥
महमसाविति बन्धुतयोदितैः ।
प्रणयिनो निशमय्य वधूर्बहिः
स्वरमृतैरमृतैरिव निर्ववौ ॥
मल्लिनाथः
(विशेषकम् ।) नेति ॥ किं चासौ ते प्रणयी दूरगतो दूरस्थोऽपि महं वसन्तोत्सवम् । `मह उद्धव उत्सवः` इत्यमरः । नातिवर्तते नातिकामति खलु इति बन्धुतया बन्धुसमूहेन । `ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यस्तल्` (अष्टाध्यायी ४.२.४३ ) इति तल्प्रत्ययः । उदितैरुक्तैः । वदेः कर्मणि क्तः । ऋतैः सत्यवचनैः । `सत्यं तथ्यमृतं सम्यक्` इत्यमरः । बहिः प्रणयिनस्तदैव दैवादागतस्य प्रियस्य स्वरं कण्ठगतं शब्दं निशमय्य श्रुत्वा । `शमु अदर्शने` इति चौरादिकाल्ल्यप् `मित्त्वाद्रस्वः` (अष्टाध्यायी ६.४.९२ ) `ल्यपि लघुपूर्वात्` (अष्टाध्यायी ६.४.५६ ) इत्ययादेशः । वधूरमृतैः सुधाभिरिव निर्ववौ निर्ववार । वाते. लिट् । `निर्वाणं निर्वृतिः सुखम्` इति
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | ख | लु | दू | र | ग | तो | ऽप्य | धि | व | र्त | ते |
| म | ह | म | सा | वि | ति | ब | न्धु | त | यो | दि | तैः |
| प्र | ण | यि | नो | नि | श | म | य्य | व | धू | र्ब | हिः |
| स्व | र | मृ | तै | र | मृ | तै | रि | व | नि | र्व | वौ |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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