कुसुमकार्मुककार्मुकसंहित-
द्रुतशिलीमुखखण्डितविग्रहाः ।
मरणमप्यपराः प्रतिपेदिरे
किमु मुहुर्मुहुर्गतभर्तृकाः ॥
कुसुमकार्मुककार्मुकसंहित-
द्रुतशिलीमुखखण्डितविग्रहाः ।
मरणमप्यपराः प्रतिपेदिरे
किमु मुहुर्मुहुर्गतभर्तृकाः ॥
द्रुतशिलीमुखखण्डितविग्रहाः ।
मरणमप्यपराः प्रतिपेदिरे
किमु मुहुर्मुहुर्गतभर्तृकाः ॥
मल्लिनाथः
कुसुमेति ॥ गतभर्तृका वियोगिन्यः । `नद्युतश्च` (अष्टाध्यायी ५.४.१५३ ) इति कप् । अपराः काश्चिदङ्गनाः कुसुमकार्मुकस्य कामस्य कार्मुके संहितैः द्रुतैर्जवनैः शिलीमुखैः शरैः खण्डितविग्रहाः पाटितशरीराः सत्यो मरणमपि प्रतिपेदिरे । मुहुः पुनःपुनः मुमुहुर्मुमूर्छुरिति किमु वक्तव्यमित्यर्थः
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | सु | म | का | र्मु | क | का | र्मु | क | सं | हि | त |
| द्रु | त | शि | ली | मु | ख | ख | ण्डि | त | वि | ग्र | हाः |
| म | र | ण | म | प्य | प | राः | प्र | ति | पे | दि | रे |
| कि | मु | मु | हु | र्मु | हु | र्ग | त | भ | र्तृ | काः | |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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