कीर्णं शनैरनुकपोलमनेकपानां
हस्तौर्विगाढमदतापरुजः शमाय ।
आकर्णमुल्लसितमम्बु विकाशिकाश-
नीकाशमाप समतां सितचामरस्य ॥
कीर्णं शनैरनुकपोलमनेकपानां
हस्तौर्विगाढमदतापरुजः शमाय ।
आकर्णमुल्लसितमम्बु विकाशिकाश-
नीकाशमाप समतां सितचामरस्य ॥
हस्तौर्विगाढमदतापरुजः शमाय ।
आकर्णमुल्लसितमम्बु विकाशिकाश-
नीकाशमाप समतां सितचामरस्य ॥
मल्लिनाथः
&#३२; कीर्णमिति ॥ अनेकपानां द्विपानां विगाढः प्ररूढो यो मदेन तापः स एव रुक् रोगस्तस्या रुजः शमाय शनैर्मन्दं हस्तैरनुकपोलं कपोलयोः कीर्णं क्षिप्तम् । आकर्णं कर्णपर्यन्तम् । `आमर्यादाभिविध्योः` (अष्टाध्यायी २.१.१३ ) इत्यव्ययीभावः । उल्लसितमुत्पतितं विकासि यत् काशं काशकुसुमं तेन सदृशं काशनीकाशम् । नित्यसमासत्वादस्वपदविग्रहः । अत एव `स्युरुत्तरपदे त्वमी । निभसंकाशनीकाशप्रतीकाशोपमादयः` इत्यमरः। अम्बु पानीयं सितचामरस्य समतां सादृश्यमाप । `तुल्याथैः-` (२।३/७२) इत्यादिना षष्ठी । उपमालंकारः
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| की | र्णं | श | नै | र | नु | क | पो | ल | म | ने | क | पा | नां |
| ह | स्तौ | र्वि | गा | ढ | म | द | ता | प | रु | जः | श | मा | य |
| आ | क | र्ण | मु | ल्ल | सि | त | म | म्बु | वि | का | शि | का | श |
| नी | का | श | मा | प | स | म | तां | सि | त | चा | म | र | स्य |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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