राजीवराजीवशलोलभृङ्गं
मुष्णान्तमुष्णं ततिभिस्तरूणाम् ।
कान्तालकान्ता ललनाः सुराणां
रक्षोभिरक्षेभितमुद्वहन्तम् ॥
राजीवराजीवशलोलभृङ्गं
मुष्णान्तमुष्णं ततिभिस्तरूणाम् ।
कान्तालकान्ता ललनाः सुराणां
रक्षोभिरक्षेभितमुद्वहन्तम् ॥
मुष्णान्तमुष्णं ततिभिस्तरूणाम् ।
कान्तालकान्ता ललनाः सुराणां
रक्षोभिरक्षेभितमुद्वहन्तम् ॥
मल्लिनाथः
राजीवेति ॥ पुनः राजीवराजीनां पद्मपङक्तीनां वशा अधीना लोलाश्चला भुंगा यस्मिंस्तं राजीवराजीवशलोलभृङ्गं तरूणां ततिभिः सङ्घैरुष्णमातपं मुष्णन्तं हरन्तं कान्ता रम्या अलकान्ताश्चूर्णकुन्तलाग्राणि यासां ताः कान्तालकान्ताः । "अलकाश्चूर्णकुन्तलाः` इत्यमरः । सुराणां ललनाः स्त्रियोऽप्सरसो रक्षोभी राक्षसैरक्षोभितमनभिभूतं यथा तथोद्वहन्तम्
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा | जी | व | रा | जी | व | श | लो | ल | भृ | ङ्गं |
| मु | ष्णा | न्त | मु | ष्णं | त | ति | भि | स्त | रू | णाम् |
| का | न्ता | ल | का | न्ता | ल | ल | नाः | सु | रा | णां |
| र | क्षो | भि | र | क्षे | भि | त | मु | द्व | ह | न्तम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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