मल्लिनाथः
विलम्बीति ॥ विलम्बिनो नीलोत्पलान्येव कर्णपूराः कर्णावतंसा यासां ताः । लोध्रेण लोध्ररजसा गौरीरवदाताः । `षिद्गौरादिभ्यश्च` (अष्टाध्यायी ४.१.४१ ) इति ङीष् । कपोलभित्तीः स्त्रीणां गण्डस्थलीरिव स्थिताः । उपमान्तरमाह-नवा उलपा बल्वजतृणानि । `उलपा बल्वजाः प्रोक्ताः` इति विश्वः। तैरलंकृतानां सैकतानामाभेवाभा यासां ताः । कुतः । शुचीः शुद्धाः शैवलवतीरपो दधानम् । शुचित्वशैवलत्वाभ्यां बिम्बप्रतिबिम्बभावेनोपमाद्वयम्
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | ल | म्बि | नी | लो | त्प | ल | क | र्ण | पू | रा |
| क | पो | ल | भि | त्ती | रि | व | लो | ध्र | गौ | रीः |
| न | वो | ल | पा | ल | ङ्कृ | त | सै | क | ता | भाः |
| शु | ची | र | पः | शै | व | ल | नी | र्द | धा | नम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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