क्वचिज्जलापायविपाण्डुराणि
धौतोत्तरीयप्रतिमच्छवीनि ।
अभ्राणिबिभ्रामुमाङ्गसङ्ग-
विभक्तभस्मानमिव स्मरारिम् ॥
क्वचिज्जलापायविपाण्डुराणि
धौतोत्तरीयप्रतिमच्छवीनि ।
अभ्राणिबिभ्रामुमाङ्गसङ्ग-
विभक्तभस्मानमिव स्मरारिम् ॥
धौतोत्तरीयप्रतिमच्छवीनि ।
अभ्राणिबिभ्रामुमाङ्गसङ्ग-
विभक्तभस्मानमिव स्मरारिम् ॥
मल्लिनाथः
क्वचिदिति ॥ पुनः क्वचिदेकदेशे जलानामपायेनापगमेन विपाण्डुराणि शुभ्राणि अत एव धौतं क्षालितं यदुत्तरीयं तत्प्रतिमा तत्समा छविर्येषां तान्यभ्राणि मेघान् बिभ्राणं दधानम् । भृञः कर्तरि शानच् । अत एवोमायाः पार्वत्या अङ्गसङ्गेनार्धभागेन विभक्तं एकभागस्थापितं भस्म यस्य तं स्मरारिं हरमिव स्थितमित्युपमालंकारः
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्व | चि | ज्ज | ला | पा | य | वि | पा | ण्डु | रा | णि |
| धौ | तो | त्त | री | य | प्र | ति | म | च्छ | वी | नि |
| अ | भ्रा | णि | बि | भ्रा | मु | मा | ङ्ग | स | ङ्ग | |
| वि | भ | क्त | भ | स्मा | न | मि | व | स्म | रा | रिम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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