सहस्रसंख्यैर्गगनं पादै-
र्भुवं व्याप्य वितिष्ठमानम् ।
विलोचनस्थानगतोष्णरश्मि-
निशाकरं साधु हिरण्यगर्भम् ॥
सहस्रसंख्यैर्गगनं पादै-
र्भुवं व्याप्य वितिष्ठमानम् ।
विलोचनस्थानगतोष्णरश्मि-
निशाकरं साधु हिरण्यगर्भम् ॥
र्भुवं व्याप्य वितिष्ठमानम् ।
विलोचनस्थानगतोष्णरश्मि-
निशाकरं साधु हिरण्यगर्भम् ॥
मल्लिनाथः
सहस्रेति ॥ सहस्रमिति संख्या येषां तैः सहस्रसंख्यैः शिरोभिः शिखरैः शीर्षैश्च गगनं तथा तत्संख्यैः पादैः प्रत्यन्तपर्वतैश्चरणैश्च भुवं च व्याप्य वितिष्ठमानमवतिष्ठमानम् । `समवप्रविभ्यः स्थः` (१॥३।२२) इत्यात्मनेपदम् । विलोचनयोर्यत्स्थानं योग्यदेशस्तद्गतावुष्णरश्मिनिशाकरौ यस्य तम् । अन्यत्र नेत्रीकृतार्केन्दुमित्यर्थः । अतः साधु सत्यं हिरण्यगर्भं ब्रह्माणमिवेत्युत्प्रेक्षा । `सहस्रशीर्षा` इत्यादिश्रुतेरिति भावः । हिरण्यगर्भो निधिगर्भश्च
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ह | स्र | सं | ख्यै | र्ग | ग | नं | पा | दै | |
| र्भु | वं | व्या | प्य | वि | ति | ष्ठ | मा | नम् | ||
| वि | लो | च | न | स्था | न | ग | तो | ष्ण | र | श्मि |
| नि | शा | क | रं | सा | धु | हि | र | ण्य | ग | र्भम् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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