उच्चैमहारजतराजिविराजितासौ
दुर्वर्णभित्तिरिह सान्द्रसुधासवर्णा ।
अभ्येति भस्मपरिपाण्डुरितस्मरारे-
रुद्वह्निलोचनललामललाटलीलाम् ॥
उच्चैमहारजतराजिविराजितासौ
दुर्वर्णभित्तिरिह सान्द्रसुधासवर्णा ।
अभ्येति भस्मपरिपाण्डुरितस्मरारे-
रुद्वह्निलोचनललामललाटलीलाम् ॥
दुर्वर्णभित्तिरिह सान्द्रसुधासवर्णा ।
अभ्येति भस्मपरिपाण्डुरितस्मरारे-
रुद्वह्निलोचनललामललाटलीलाम् ॥
मल्लिनाथः
उच्चैरिति ॥ इहाद्रौ सान्द्रया सुधया लेपविशेषेणामृतेन वा सवर्णा समानवर्णा । `ज्योतिर्जनपद-` (अष्टाध्यायी ६.३.८५ ) इत्यादिना समानस्य सादेशः । `लेपभेदेऽमृते सुधा` इति वैजयन्ती । महारजतराजिविराजिता काञ्चनरेखाशोभिता असौ पुरोवर्तिनी उच्चैरुन्नता दुर्वर्णभित्ती रजतभित्तिः । `महारजतकाञ्चने` इति,`दुर्वणं रजतं रूप्यम्` इति चामरः । भस्मना परिपाण्डुरितस्य स्मरारेरुद्वह्नि उद्गतार्चिलोचनमेव ललामं भूषणं यस्य तस्य ललाटस्य लीलां शोभामभ्येति भजतीति निदर्शनालंकारः । `ललामं पुच्छपुण्ड्राश्वभूषाप्राधान्यकेतुषु` इत्यमरः
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | च्चै | म | हा | र | ज | त | रा | जि | वि | रा | जि | ता | सौ |
| दु | र्व | र्ण | भि | त्ति | रि | ह | सा | न्द्र | सु | धा | स | व | र्णा |
| अ | भ्ये | ति | भ | स्म | प | रि | पा | ण्डु | रि | त | स्म | रा | रे |
| रु | द्व | ह्नि | लो | च | न | ल | ला | म | ल | ला | ट | ली | लाम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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