उच्चारणज्ञेऽथगिरादधान-
मुच्चा रणत्पक्षिगणास्तटीस्तम् ।
उत्कं धरं द्रष्टुमवेक्ष्य शौरि-
णुत्कन्धरं दारुक इत्युवाच ॥
उच्चारणज्ञेऽथगिरादधान-
मुच्चा रणत्पक्षिगणास्तटीस्तम् ।
उत्कं धरं द्रष्टुमवेक्ष्य शौरि-
णुत्कन्धरं दारुक इत्युवाच ॥
मुच्चा रणत्पक्षिगणास्तटीस्तम् ।
उत्कं धरं द्रष्टुमवेक्ष्य शौरि-
णुत्कन्धरं दारुक इत्युवाच ॥
मल्लिनाथः
उच्चारणज्ञ इति ॥ अथ हरिविस्मयानन्तरं गिरां वाक्यानामुच्चारणं जानातीत्युच्चारणज्ञ उक्तिकुशलः । `आतोऽनुपसर्गे कः` (अष्टाध्यायी ३.२.३ ) इति कप्रत्ययः । न `इगुपध` (अष्टाध्यायी ३.१.१३५ ) इत्यादिना `आकारादनुपपदात्कर्मोपपदो भवति विप्रतिषेधेन` इति वचनात् । दारुकः कृष्णसारथिरुच्चा उन्नता रणन्तः शब्दायमानाः पक्षिगणा यासु ता रणत्पक्षिगणास्तटीर्दधानं तं पूर्वोक्तं । धरतीति धरं पर्वतम् । पचाद्यच् । `अहार्यधरपर्वताः` इत्यमरः । द्रष्टुमुत्कमुत्सुकम् । `उत्क उन्मनाः` (अष्टाध्यायी ५.२.८० ) इति निपातः । उत्कंधरमौत्सुक्यादुन्नमितकंधरं शौरिमवेक्ष्य इति वक्ष्यमाणक्रमेण वाचमुवाच । नहीङ्गितज्ञोऽवसरेऽवसीदतीति भावः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | च्चा | र | ण | ज्ञे | ऽथ | गि | रा | द | धा | न |
| मु | च्चा | र | ण | त्प | क्षि | ग | णा | स्त | टी | स्तम् |
| उ | त्कं | ध | रं | द्र | ष्टु | म | वे | क्ष्य | शौ | रि |
| णु | त्क | न्ध | रं | दा | रु | क | इ | त्यु | वा | च |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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