मल्लिनाथः
दृष्टोऽपीति ॥ मुहुर्दृष्टोऽपि स शैलो मुरारेरपूर्वेणादृष्टपूर्वेण तुल्यमपूर्ववत् । `तेन तुल्यं क्रिया चेत्-` (अष्टाध्यायी ५.१.११५ ) इति वतिः । विस्मयमाततान । अतिरमणीयत्वादिति भावः । तथा हि—क्षणे क्षणे प्रतिक्षणम् । वीप्सायां द्विर्भावः । नवतामपूर्ववद्भावमुपैतीति यत् , तन्नवत्वोपगमनमेव रमणीयताया रूपं स्वरूपम् । लक्षणमित्यर्थः । अत्र रमणीयत्वलक्षणस्य वाक्यार्थस्य विस्मये हेतुत्वसमर्थनाद्वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलंकारः
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | ष | टो | ऽपि | शै | लः | स | मु | हु | र्मु | रा | रे |
| र | पू | र्व | व | द्वि | स्म | य | मा | त | ता | न | |
| क्ष | णे | क्ष | मे | य | न्न | व | ता | मु | पै | ति | |
| त | दे | व | रू | पं | र | म | णी | य | ता | याः | |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||
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