साटोपमुर्वीमनिशं नदन्तः
यैः प्लवयिष्यन्ति समन्ततःऽमी ।
तान्यकदेशान्निभृतंपयोधेः
सोऽम्भांसि मेघान्पिबतः ददर्श ॥
साटोपमुर्वीमनिशं नदन्तः
यैः प्लवयिष्यन्ति समन्ततःऽमी ।
तान्यकदेशान्निभृतंपयोधेः
सोऽम्भांसि मेघान्पिबतः ददर्श ॥
यैः प्लवयिष्यन्ति समन्ततःऽमी ।
तान्यकदेशान्निभृतंपयोधेः
सोऽम्भांसि मेघान्पिबतः ददर्श ॥
मल्लिनाथः
साटोपमिति ॥ अमी मेघाः साटोपं ससंभ्रमम् । `संभ्रमाटोपसंरम्भाः` इति यादवः । अनिशं नदन्तो गर्जन्तो यैस्तोयैरम्भोभिरुर्वीं समन्ततः प्लावयिष्यन्ति तान्यम्भांसि पयोधेरेकदेशादेककोणान्निभृतं निश्चलं यथा तथा पिबतो मेघान् स हरिददर्श । एतेन समुद्रस्यापरिच्छिन्नरूपत्वं व्यज्यते
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सा | टो | प | मु | र्वी | म | नि | शं | न | द | न्तः |
| यैः | प्ल | व | यि | ष्य | न्ति | स | म | न्त | तः | ऽमी |
| ता | न्य | क | दे | शा | न्नि | भृ | तं | प | यो | धेः |
| सो | ऽम्भां | सि | मे | घा | न्पि | ब | तः | द | द | र्श |
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