शनैरनीयन्त रयात्पतन्तो-
रथाः क्षितिं हस्तिनखादखेदैः ।
सयत्नसूतायतरशमिभु-
ग्नग्रीवाग्रसंसक्तयुगैस्तुरङ्गै ॥
शनैरनीयन्त रयात्पतन्तो-
रथाः क्षितिं हस्तिनखादखेदैः ।
सयत्नसूतायतरशमिभु-
ग्नग्रीवाग्रसंसक्तयुगैस्तुरङ्गै ॥
रथाः क्षितिं हस्तिनखादखेदैः ।
सयत्नसूतायतरशमिभु-
ग्नग्रीवाग्रसंसक्तयुगैस्तुरङ्गै ॥
मल्लिनाथः
शनैरिति ॥ रयात्पतन्तो धावन्तो रथाः सयत्नैः सूतैः सारथिभिः । `सूतः क्षत्ता च सारथिः` इत्यमरः । आयता आकृष्टा ये रश्मयः प्रग्रहाः। `किरणप्रग्रहौ रश्मी` इत्यमरः । तैर्भुग्नेषु प्रह्वेषु ग्रीवाणामग्रेषु संसक्ता युगा युग्याः स्कन्धवाह्या दारुविशेषा येषां तैरत एवाखेदैरश्रमैस्तुरंगैः। हस्तिनखात् । हस्तिनखः पूर्द्वारि मृत्कूटः । `कूटं पूर्द्वारि यद्धस्तिनखस्तस्मिन्` इत्यमरः । तस्माच्छनैः क्षितिमनीयन्त नीता इति स्वभावोक्तिः । यथावद्वस्तुवर्णनात्
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | नै | र | नी | य | न्त | र | या | त्प | त | न्तो | |
| र | थाः | क्षि | तिं | ह | स्ति | न | खा | द | खे | दैः | |
| स | य | त्न | सू | ता | य | त | र | श | मि | भु | |
| ग्न | ग्री | वा | ग्र | सं | स | क्त | यु | गै | स्तु | र | ङ्गै |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||
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