प्रजा इवाङ्गादरविन्दनाभेः
शंभोर्जटाजूटतटादिवापः ।
मुखादिवाथ श्रुतयो विधातुः
पुरान्निरीयुर्मुरजिद्ध्वजिन्यः ॥
प्रजा इवाङ्गादरविन्दनाभेः
शंभोर्जटाजूटतटादिवापः ।
मुखादिवाथ श्रुतयो विधातुः
पुरान्निरीयुर्मुरजिद्ध्वजिन्यः ॥
शंभोर्जटाजूटतटादिवापः ।
मुखादिवाथ श्रुतयो विधातुः
पुरान्निरीयुर्मुरजिद्ध्वजिन्यः ॥
मल्लिनाथः
प्रजा इति ॥ अरविन्दनाभेर्विष्णोरङ्गात् प्रजा इव । `यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते` इति श्रुतेरिति भावः । शंभोर्जटाजूटतटात् आप इव गङ्गाजलानीव विधातुर्मुखात् श्रुतय इव मुरजितो हरेः ध्वजिन्यः सेनाः पुरान्निरीयुर्निर्गताः । मालोपमेयम्
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | जा | इ | वा | ङ्गा | द | र | वि | न्द | ना | भेः |
| शं | भो | र्ज | टा | जू | ट | त | टा | दि | वा | पः |
| मु | खा | दि | वा | थ | श्रु | त | यो | वि | धा | तुः |
| पु | रा | न्नि | री | यु | र्मु | र | जि | द्ध्व | जि | न्यः |
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