तामीक्षमाणः स पुरं पुरस्ता-
त्प्रापत्प्रतोलीमतुलप्रतापः ।
वज्रप्रभोद्भासिसुरायुधश्री-
र्या देवसेनेव परैरलङ्घ्या ॥
तामीक्षमाणः स पुरं पुरस्ता-
त्प्रापत्प्रतोलीमतुलप्रतापः ।
वज्रप्रभोद्भासिसुरायुधश्री-
र्या देवसेनेव परैरलङ्घ्या ॥
त्प्रापत्प्रतोलीमतुलप्रतापः ।
वज्रप्रभोद्भासिसुरायुधश्री-
र्या देवसेनेव परैरलङ्घ्या ॥
मल्लिनाथः
तामिति ॥ अतुलप्रतापः स हरिस्तां पूर्वोक्तां पुरमीक्षमाणः पुरस्तात् पूर्वस्यां दिशि । सप्तम्यर्थे तसिल् प्रत्ययः । प्रतोली रथ्याम् । `रथ्या प्रतोली विशिखा` इत्यमरः । प्रापत् प्राप्तवान् । लुङि `पुषादि-` (अष्टाध्यायी ३.१.५५ ) इत्यादिना च्लेरङादेशः । वज्राणां तोरणप्रासादादिगतहीरकादिमणीनां प्रभाभिरुद्भासिनी सुरायुधश्रीरिन्द्रचापलक्ष्मीर्यस्यां सा । इह वज्रग्रहणं मणिमात्रोपलक्षणम् । अन्यथेन्द्रायुधासाम्यादिति भावः । अन्यत्र वज्रस्य कुलिशस्य प्रभाभिरुद्भासिनी सुरायुधानाभितरदेवतायुधानां श्रीर्यस्याः सा । `वज्रोऽस्त्री हीरके पवौ` इत्यमरः । या प्रतोली देवसेना सुरचमूरिव परैः शत्रुभिरलङ्घ्या दुष्प्रधर्ष्या
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ता | मी | क्ष | मा | णः | स | पु | रं | पु | र | स्ता |
| त्प्रा | प | त्प्र | तो | ली | म | तु | ल | प्र | ता | पः |
| व | ज्र | प्र | भो | द्भा | सि | सु | रा | यु | ध | श्री |
| र्या | दे | व | से | ने | व | प | रै | र | ल | ङ्घ्या |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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