क्षितिप्रतिष्ठोपि मुखारविन्दै-
र्वधूजनश्चन्द्रमधश्चकार ।
अतीतनक्षत्रपथानि यत्र
प्रसादशृङ्गाणि वृथाध्यरुक्षत् ॥
क्षितिप्रतिष्ठोपि मुखारविन्दै-
र्वधूजनश्चन्द्रमधश्चकार ।
अतीतनक्षत्रपथानि यत्र
प्रसादशृङ्गाणि वृथाध्यरुक्षत् ॥
र्वधूजनश्चन्द्रमधश्चकार ।
अतीतनक्षत्रपथानि यत्र
प्रसादशृङ्गाणि वृथाध्यरुक्षत् ॥
मल्लिनाथः
क्षितीति ॥ यस्यां पुरि वधूजनः क्षितौ प्रतिष्ठा यस्य स भूमिस्थितोऽपि चन्द्रम् । दिवि स्थितमिति भावः । तत्रापि मुखैरेवारविन्दैरधश्चकारेति विरोधः । स्वलावण्यमहिम्नाऽधरीचकारेति परिहाराद्विरोधालंकारः । अतीतानि नक्षत्रपथमतीतनक्षत्रपथानि । `अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया` (वा०) इति समासः । “द्विगुप्राप्तापन्ना-` (वा.) इत्यादिना परवल्लिङ्गताप्रतिषेधः । प्रासादशृङ्गाणि वृथा अध्यक्षदधिरोहति स्म । अनधिरुह्यैवाधःकरणादिति भावः । रोहतेर्लुङ् । `शल इगुपधादनिटः क्सः` (अष्टाध्यायी ३.१.४५ ) इति च्लेः क्सादेशः । अत्राधःकरणवाक्यार्थस्य श्लेषविरोधोपजीव्यवैयर्थं हेतुत्वात्संकीर्णः काव्यलिङ्गभेदः
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्षि | ति | प्र | ति | ष्ठो | पि | मु | खा | र | वि | न्दै |
| र्व | धू | ज | न | श्च | न्द्र | म | ध | श्च | का | र |
| अ | ती | त | न | क्ष | त्र | प | था | नि | य | त्र |
| प्र | सा | द | शृ | ङ्गा | णि | वृ | था | ध्य | रु | क्षत् |
| ज | त | ज | ग | ग | ||||||
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