कान्तेन्दुकान्तोपलकुट्टिमेषु
प्रतिक्षपं हर्म्यतलेषु यत्र ।
उच्चैरधपातिपयोमुचोऽपि
समूहमूहुः पययसां प्रणाल्यः ॥
कान्तेन्दुकान्तोपलकुट्टिमेषु
प्रतिक्षपं हर्म्यतलेषु यत्र ।
उच्चैरधपातिपयोमुचोऽपि
समूहमूहुः पययसां प्रणाल्यः ॥
प्रतिक्षपं हर्म्यतलेषु यत्र ।
उच्चैरधपातिपयोमुचोऽपि
समूहमूहुः पययसां प्रणाल्यः ॥
मल्लिनाथः
कान्तेति ॥ यत्र पुरि क्षपासु रात्रिषु प्रतिक्षपम् । विभक्त्यर्थेऽव्ययीभावः । कान्तानि रम्याणीन्दुकान्तोपलानां चन्द्रकान्तमणीनां कुट्टिमानि बद्धभूमयो येषु तेषु । `कुट्टिमं बद्धभूमिः स्यात्` इति हलायुधः । हर्म्यतलेपूच्चैरुन्नताः प्रणाल्यो जलमार्गाः । `द्वयोः प्रणाली पयसः पदव्याम्` इत्यमरः । अधःपातिनोऽधश्चराः पयोमुचो मेघा यासां ताः । अधःकृतमेघमण्डलत्वात् अज्ञातवृष्टिपाता अपीत्यर्थः । विरोधालंकारः । पयसां समूहं पयःपूरं मुहुर्वहन्ति स्म । चन्द्रकान्तनिप्यन्दैरिति भावः । वहेर्लिट् `वचिस्वपि-` (अष्टाध्यायी ६.१.१५ ) इत्यादिना संप्रसारणम् । अत्र सौधानां प्रणालीनां च तादृगौन्नत्यपयःपूरासंबन्धेऽपि तत्संबन्धोक्त्यातिशयोक्तिः
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | न्ते | न्दु | का | न्तो | प | ल | कु | ट्टि | मे | षु | |
| प्र | ति | क्ष | पं | ह | र्म्य | त | ले | षु | य | त्र | |
| उ | च्चै | र | ध | पा | ति | प | यो | मु | चो | ऽपि | |
| स | मू | ह | मू | हुः | प | य | य | सां | प्र | णा | ल्यः |
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