यदङ्गनरूपसरूपतायाः
कञ्चिद्गुणं भेदकमिच्छतीभिः ।
आराधितोऽद्धा मनुरप्सरोभि-
श्चक्रे प्रजाः स्वाः सनिमेषचिह्नाः ॥
यदङ्गनरूपसरूपतायाः
कञ्चिद्गुणं भेदकमिच्छतीभिः ।
आराधितोऽद्धा मनुरप्सरोभि-
श्चक्रे प्रजाः स्वाः सनिमेषचिह्नाः ॥
कञ्चिद्गुणं भेदकमिच्छतीभिः ।
आराधितोऽद्धा मनुरप्सरोभि-
श्चक्रे प्रजाः स्वाः सनिमेषचिह्नाः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | द | ङ्ग | न | रू | प | स | रू | प | ता | याः |
| क | ञ्चि | द्गु | णं | भे | द | क | मि | च्छ | ती | भिः |
| आ | रा | धि | तो | ऽद्धा | म | नु | र | प्स | रो | भि |
| श्च | क्रे | प्र | जाः | स्वाः | स | नि | मे | ष | चि | ह्नाः |
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