कुतूहलेन जवादुपेत्य
प्राकारभित्या सहसा निषिद्धः ।
रसन्नरोदीद्भृशमम्बुवर्ष-
व्याजेन यस्या बहिरम्बुवाहः ॥
कुतूहलेन जवादुपेत्य
प्राकारभित्या सहसा निषिद्धः ।
रसन्नरोदीद्भृशमम्बुवर्ष-
व्याजेन यस्या बहिरम्बुवाहः ॥
प्राकारभित्या सहसा निषिद्धः ।
रसन्नरोदीद्भृशमम्बुवर्ष-
व्याजेन यस्या बहिरम्बुवाहः ॥
मल्लिनाथः
कुतूहलेनेति ॥ अम्बु वहतीत्यम्बुवाहो मेघः । कर्मण्यण् । कुतूहलेनान्त:प्रवेशकौतुकेनेवेति हेतूत्प्रेक्षा । जवादुपेत्य यस्याः प्राकारभित्त्या सहसा निषिद्धो निवारितः अत एव बहिरेव रसन् गर्जन् । दुःखात् क्रन्दंश्चेति श्लेषः । अम्बुवर्षव्याजेन भृशमरोदीत् अश्रूणि मुक्तवान् । `रुदिर् अश्रुविमोचने` लङ् `रुदश्च पञ्चभ्यः` (अष्टाध्यायी ७.३.९८ ) इतीडागमः । अत्राम्बुवर्षव्याजेनोत्पादकस्योक्तश्लेषोत्प्रेक्षासापेक्षत्वात्संकरः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | तू | ह | ले | न | ज | वा | दु | पे | त्य | |
| प्रा | का | र | भि | त्या | स | ह | सा | नि | षि | द्धः |
| र | स | न्न | रो | दी | द्भृ | श | म | म्बु | व | र्ष |
| व्या | जे | न | य | स्या | ब | हि | र | म्बु | वा | हः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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