विरोधिनां विग्रहभेददक्षा मूर्तेव शक्तिः क्वचितस्खलन्ती ।
नित्यं हरेः संनिहिता निकामं मोदयति स्म चेतः ॥
विरोधिनां विग्रहभेददक्षा मूर्तेव शक्तिः क्वचितस्खलन्ती ।
नित्यं हरेः संनिहिता निकामं मोदयति स्म चेतः ॥
नित्यं हरेः संनिहिता निकामं मोदयति स्म चेतः ॥
मल्लिनाथः
विरोधिनामिति ॥ विरोधिनां वैरिणां विग्रहभेदे शरीरविदारणे दक्षा । `शरीरं वर्ष्म विग्रहः` इत्यमरः । क्वचित्क्वाप्यस्खलन्ती । सर्वत्राप्रतिहतवृत्तिरित्यर्थः । नित्यं संनिहिता अनपायिनी । अत एव मूर्ता मूर्तिमती शक्तिः सामर्थ्यमिव स्थितेत्युत्प्रेक्षा । कौमोदकी गदा हरेश्चेतो निकामं मोदयति स्म । स्वसंनिधानेनेति भावः
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | रो | धि | नां | वि | ग्र | ह | भे | द | द | क्षा |
| मू | र्ते | व | श | क्तिः | क्व | चि | त | स्ख | ल | न्ती |
| नि | त्यं | ह | रेः | सं | नि | हि | ता | नि | का | मं |
| मो | द | य | ति | स्म | चे | तः | ||||
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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