मल्लिनाथः
कपाटेति ॥ कपाटवद्विस्तीर्णे मनोरमे च उरःस्थले स्थिता श्रीरिति ललना कान्ता यस्य तस्य हरेरानन्दिताशेषजना सर्वाङ्गसङ्गिनी सकलदेहव्यापिनी अत एवापरैवासाधारण्येव श्रीदेव्या अन्यैव लक्ष्मीः शोभा, रमा च बभूव । स एवालंकारः । प्रायेणैकार्थमप्यनेकं श्लोकमुक्तिविशेषलाभाल्लिखन्ति कवयः । यथाह नैषधे-आदावेव `निपीय-` (१।१) इत्यादिश्लोकद्वयं; तथा `स्वकेलिलेश-` (१।२३) इत्यादिश्लोकद्वयं चेति
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | पा | ट | वि | स्ती | र्ण | म | नो | र | मो | रः |
| स्थ | ल | स्थि | त | श्री | ल | ल | न | स्य | त | स्य |
| आ | न | न्दि | ता | शे | ष | ज | ना | ब | भू | व |
| स | र्व | ङ्ग | स | ङ्गि | न्य | प | रै | व | ल | क्ष्मीः |
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