स इन्द्रनीलसस्थलनीलमूर्ती
रराज कर्पूरपिशङ्गवासाः ।
विसृत्वरैरम्बुरुहां रजोभि-
र्यमस्वसुश्चित्र इवोदभारः ॥
स इन्द्रनीलसस्थलनीलमूर्ती
रराज कर्पूरपिशङ्गवासाः ।
विसृत्वरैरम्बुरुहां रजोभि-
र्यमस्वसुश्चित्र इवोदभारः ॥
रराज कर्पूरपिशङ्गवासाः ।
विसृत्वरैरम्बुरुहां रजोभि-
र्यमस्वसुश्चित्र इवोदभारः ॥
मल्लिनाथः
स इति ॥ इन्द्रनीलस्थलमिम नीलमूर्तिः श्यामाङ्गः । संहितायां रोरि` (अष्टाध्यायी ८.३.१४ ) इति रेफलोपः । `ढ्लोपे पूर्वस्य-` (अष्टाध्यायी ६.३.१११ ) इति दीर्घः । कर्चूरं हरितालमिव पिशङ्गं वासो यस्य स पीताम्बरो हरिः । `हरितालं तु कर्चूरम्` इति वैजयन्ती । स हरिर्विसृत्वरैर्विसृमरैः। `इण्नशजिसर्तिभ्यः क्वरप्` (अष्टाध्यायी ३.२.१६३ ) अम्बुरुहामम्बुजानाम् । रुहेः क्विप् । रजोभिः परागैश्चित्रश्चित्रवर्णो यमस्वसुर्यमुनाया उदकस्य भारः पूर उदभारः स इव रराज । `मन्थौदन-` (अष्टाध्यायी ६.३.६० ) इत्यादिनोदकस्योदादेशः
छन्दः
उपेन्द्रवज्रा [११: जतजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | इ | न्द्र | नी | ल | स | स्थ | ल | नी | ल | मू | र्ती |
| र | रा | ज | क | र्पू | र | पि | श | ङ्ग | वा | साः | |
| वि | सृ | त्व | रै | र | म्बु | रु | हां | र | जो | भि | |
| र्य | म | स्व | सु | श्चि | त्र | इ | वो | द | भा | रः | |
| ज | त | ज | ग | ग | |||||||
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