सवितुः परिभावुकैर्मरीची-
नचिराभ्यक्तमतङ्गजाङ्गभाभिः ।
जलदैरभितः स्फुरद्भिरुच्चै-
र्विदधे केतनतेव धूमकेतोः ॥
सवितुः परिभावुकैर्मरीची-
नचिराभ्यक्तमतङ्गजाङ्गभाभिः ।
जलदैरभितः स्फुरद्भिरुच्चै-
र्विदधे केतनतेव धूमकेतोः ॥
नचिराभ्यक्तमतङ्गजाङ्गभाभिः ।
जलदैरभितः स्फुरद्भिरुच्चै-
र्विदधे केतनतेव धूमकेतोः ॥
मल्लिनाथः
सवितुरिति ॥ सवितुमरीचीन्मयूखान् परिभावुकैस्तिरस्कुर्वद्भिः । `लषपत-` (अष्टाध्यायी ३.२.१५४ ) इत्यादिना उकञ्प्रत्यये `न लोका-` (अष्टाध्यायी २.३.६९ ) इत्यादिना षष्ठीप्रतिषेधः । अचिराभ्यक्तस्य सद्यःकृताभ्यङ्गस्य मतङ्गजाङ्गस्य नागदेहस्येव भासो येषां तैस्तथोक्तैः । `भोभगो-` (अष्टाध्यायी ८.३.१७ ) इत्यादिना रोर्यकारस्य `हलि सर्वेषाम्` (अष्टाध्यायी ८.३.२२ ) इति लोपः । अभितः स्फुरद्भिर्जुम्भमाणैरुच्चैरुन्नतैर्जलदेधूमकेतोरग्नेः केतनता केतुत्वं विदधे इव विहितेव । धूमकेतोः केतुत्वं प्राप्तमित्यर्थः । उत्प्रेक्षालंकारः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वि | तुः | प | रि | भा | वु | कै | र्म | री | ची | |
| न | चि | रा | भ्य | क्त | म | त | ङ्ग | जा | ङ्ग | भा | भिः |
| ज | ल | दै | र | भि | तः | स्फु | र | द्भि | रु | च्चै | |
| र्वि | द | धे | के | त | न | ते | व | धू | म | के | तोः |
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