खचरैः क्षयमक्षयेऽहिसैन्ये
सुकृतैर्दुष्कृतवत्तदोपनीते ।
अयुगाचिरिव ज्वलन्रुषाथो
रिपुरौदर्चिषमाजुहाव मन्त्रम् ॥
खचरैः क्षयमक्षयेऽहिसैन्ये
सुकृतैर्दुष्कृतवत्तदोपनीते ।
अयुगाचिरिव ज्वलन्रुषाथो
रिपुरौदर्चिषमाजुहाव मन्त्रम् ॥
सुकृतैर्दुष्कृतवत्तदोपनीते ।
अयुगाचिरिव ज्वलन्रुषाथो
रिपुरौदर्चिषमाजुहाव मन्त्रम् ॥
मल्लिनाथः
विंशः सर्गः। खचरैरिति ॥ खे चरन्तीति खचरैर्वैनतेयैः । चरेष्टः `तत्पुरुषे कृति बहुलम्` (अष्टाध्यायी ६.३.१४ ) इति लुग्विकल्पः । अक्षये अनन्ते अहिसैन्ये सर्पसङ्घे सुकृतैः हरिस्मरणादिपुण्यैर्दुष्कृतवद्ब्रह्महत्यायेनोवत् । `तत्र तस्येव` (अष्टाध्यायी ५.१.११६ ) इति तत्रार्थे वतिप्रत्ययः । क्षयमुपनीते नाशं गमिते सति तदा तत्काले रुषा पौरुषवैफल्यरोषेण अयुगार्चिः सप्ताचिरिव ज्वलन्दीप्यमानः असौ रिपुश्चैद्यः । उदर्चिष इममौदर्चिषम् आग्नेयं मन्त्रमाजुहाव आहूतवान् । जजापेत्यर्थः । ह्वयतेर्लिद । `अभ्यस्तस्य च` (६।१॥३३) इति द्विर्वचनात्प्रागेव संप्रसारणम् । दुष्कृत वदिति तद्धितगता श्रौती पूर्णोपमा
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ख | च | रैः | क्ष | य | म | क्ष | ये | ऽहि | सै | न्ये | |
| सु | कृ | तै | र्दु | ष्कृ | त | व | त्त | दो | प | नी | ते |
| अ | यु | गा | चि | रि | व | ज्व | ल | न्रु | षा | थो | |
| रि | पु | रौ | द | र्चि | ष | मा | जु | हा | व | म | न्त्रम् |
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