प्रचलत्पतगेन्द्रपत्रवात-
प्रसभोन्मूलितशैलदत्तमार्गैः ।
भयविह्वलमाशु दन्दशूकै-
र्विवशैराविविशे स्वमेव धाम ॥
प्रचलत्पतगेन्द्रपत्रवात-
प्रसभोन्मूलितशैलदत्तमार्गैः ।
भयविह्वलमाशु दन्दशूकै-
र्विवशैराविविशे स्वमेव धाम ॥
प्रसभोन्मूलितशैलदत्तमार्गैः ।
भयविह्वलमाशु दन्दशूकै-
र्विवशैराविविशे स्वमेव धाम ॥
मल्लिनाथः
प्रचलदिति ॥ प्रचलतां पतगेन्द्राणां ये पत्रवातास्तैः प्रसभं उन्मूलितैराकृष्टैरुत्टिपाटितैः शैलैर्दत्तो मार्गो रन्ध्र येभ्यस्तैः विवशैः परवशैः । निश्चेष्टैरित्यर्थः गर्हितं दशन्ति भृशमिति दन्दशूकैः सः । `दन्दशूको बिलेशयः` इत्यमरः । `लुपसदचर-` (अष्टाध्यायी ३.१.२४ ) इत्यादिना दंशेर्भावगर्हायां यङ् । `जपजभदहदशभञ्जपशां च` (७४।८६) इत्यभ्यासस्य नुगागमः । `यजजपदशां यङः` (३॥ १६६) इति दशेर्यङन्तादुकन्प्रत्ययः । भयेन विह्वलं विक्षिप्तं विचित्रं यथा तथा स्वमेव धाम पातालमेव विविशे तार्क्ष्यपत्रपवनोन्मूलितशैलरन्ध्रवर्त्मनैव पातालं प्रविष्टमित्यर्थः । विशेः कर्मणि लिद । दन्दशूकानां रन्ध्रप्रवेशासंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | च | ल | त्प | त | गे | न्द्र | प | त्र | वा | त | |
| प्र | स | भो | न्मू | लि | त | शै | ल | द | त्त | मा | र्गैः |
| भ | य | वि | ह्व | ल | मा | शु | द | न्द | शू | कै | |
| र्वि | व | शै | रा | वि | वि | शे | स्व | मे | व | धा | म |
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