अभितः क्षुभिताम्बुराशिधीर-
ध्वनिराकृष्टसमूलपादपौघः ।
जनयन्नभवद्युगान्तशङ्का-
मनिलो नागविपक्षपक्षजन्मा ॥
अभितः क्षुभिताम्बुराशिधीर-
ध्वनिराकृष्टसमूलपादपौघः ।
जनयन्नभवद्युगान्तशङ्का-
मनिलो नागविपक्षपक्षजन्मा ॥
ध्वनिराकृष्टसमूलपादपौघः ।
जनयन्नभवद्युगान्तशङ्का-
मनिलो नागविपक्षपक्षजन्मा ॥
मल्लिनाथः
अभीति ॥ अभितः उभयतः क्षुभितो योऽम्बुराशिः उद्वेलाम्बुराशिस्तद्धीरध्वनिर्गम्भीरध्वनिरित्युपमा । आकृष्टाः पाटिताः समूलाः पादपौधास्तरुसमूहा येन सः । अत्र पादपोन्मूलनासंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः । युगान्तशङ्कां जनयन्कल्पक्षयोत्प्रेक्षां जनयन्नित्यपि सैवातिशयोक्तिः । नागविपक्षपक्षजन्मा गरुडपक्षोद्भवोऽनिलोऽभवत् । उदभवदित्यर्थः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | तः | क्षु | भि | ता | म्बु | रा | शि | धी | र | |
| ध्व | नि | रा | कृ | ष्ट | स | मू | ल | पा | द | पौ | घः |
| ज | न | य | न्न | भ | व | द्यु | गा | न्त | श | ङ्का | |
| म | नि | लो | ना | ग | वि | प | क्ष | प | क्ष | ज | न्मा |
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