द्रुतहेमरुचः खगाः खगेन्द्रा-
दलघूदीरितनादमुत्पतन्तः ।
क्षणमैक्षिषतोच्चकैश्चमूभि-
र्ज्वलतः सप्तरुचेरिव स्फुलिङ्गाः ॥
द्रुतहेमरुचः खगाः खगेन्द्रा-
दलघूदीरितनादमुत्पतन्तः ।
क्षणमैक्षिषतोच्चकैश्चमूभि-
र्ज्वलतः सप्तरुचेरिव स्फुलिङ्गाः ॥
दलघूदीरितनादमुत्पतन्तः ।
क्षणमैक्षिषतोच्चकैश्चमूभि-
र्ज्वलतः सप्तरुचेरिव स्फुलिङ्गाः ॥
मल्लिनाथः
द्रुतेति ॥ द्रुतहेमरुचः प्रतप्तकाञ्चनभास इत्युपमा । अलघूच्चैरुदीरितनादं उच्चरितघोषं यथा तथा खगेन्द्राद्रुत्मतः उत्पतन्तः उद्भवन्तः खगाः सुपर्णा ज्वलतः प्रज्वलतः सप्तरुचेः सप्तार्चिषोऽग्नेरुच्चकैरूवं प्रसृताः स्फुलिङ्गा इव चमूभिः क्षणमैक्षिषत ईक्षिताः । ईक्षतेः कर्मणि लुङ् । अत्रोपमयोः संकरः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्रु | त | हे | म | रु | चः | ख | गाः | ख | गे | न्द्रा | |
| द | ल | घू | दी | रि | त | ना | द | मु | त्प | त | न्तः |
| क्ष | ण | मै | क्षि | ष | तो | च्च | कै | श्च | मू | भि | |
| र्ज्व | ल | तः | स | प्त | रु | चे | रि | व | स्फु | लि | ङ्गाः |
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