परिवेष्टितमूर्तयश्च मूला-
दुरगैराशिरसः सरत्नपुष्पैः ।
दधुरायतवल्लिवेष्टिताना-
मुपमानं मनुजा महीरुहाणाम् ॥
परिवेष्टितमूर्तयश्च मूला-
दुरगैराशिरसः सरत्नपुष्पैः ।
दधुरायतवल्लिवेष्टिताना-
मुपमानं मनुजा महीरुहाणाम् ॥
दुरगैराशिरसः सरत्नपुष्पैः ।
दधुरायतवल्लिवेष्टिताना-
मुपमानं मनुजा महीरुहाणाम् ॥
मल्लिनाथः
परिवेष्टितेति ॥ किंचेति चार्थः । मूलात् । पादमारभ्येत्यर्थः । ल्यब्लोपे पञ्चमी । आशिरसः शिरोन्तम् । अभिविधावाडिति विकल्पादसमासः । रतैरेव पुष्पैः सह वर्तन्ते इति सरत्रपुष्पैः । `तेन सहेति तुल्ययोगे` (अष्टाध्यायी २.२.२८ ) इति बहुव्रीहिः । उरगैः परिवेष्टितमूर्तयो वेष्टिताङ्गा मनुजा आयताभिर्वल्लीभिर्लताभिर्वैष्टितानां महीरुहाणामुपमानं सादृश्यं दधुरित्युपमा
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | वे | ष्टि | त | मू | र्त | य | श्च | मू | ला | |
| दु | र | गै | रा | शि | र | सः | स | र | त्न | पु | ष्पैः |
| द | धु | रा | य | त | व | ल्लि | वे | ष्टि | ता | ना | |
| मु | प | मा | नं | म | नु | जा | म | ही | रु | हा | णाम् |
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