कृतमण्डलबन्धमुल्लसद्भिः
शिरसि प्रत्युरसं विलम्बमानैः ।
व्यरुचज्जनता भुजङ्गभोगै-
र्दलितेन्दीवरमालभारिणीव ॥
कृतमण्डलबन्धमुल्लसद्भिः
शिरसि प्रत्युरसं विलम्बमानैः ।
व्यरुचज्जनता भुजङ्गभोगै-
र्दलितेन्दीवरमालभारिणीव ॥
शिरसि प्रत्युरसं विलम्बमानैः ।
व्यरुचज्जनता भुजङ्गभोगै-
र्दलितेन्दीवरमालभारिणीव ॥
मल्लिनाथः
कृतेति ॥ जनता जनसमूहः । `ग्रामजन-` (अष्टाध्यायी ४.२.४३ ) इत्यादिना सामूहिकस्तल्प्रत्ययः । शिरसि कृतो मण्डलबन्धो वलयीभावो यस्मिन्कर्मणि तत्तथा उल्लसद्भिः प्रत्युरसं उरसि उरसि । `प्रतेरुरसः सप्तमीस्थात्` (अष्टाध्यायी ५.४.८२ ) इति समासान्तोऽच्प्रत्ययः । विलम्बमानैर्विशेषेण लम्बमानैः भुजंगभोगैरहिकायैः दलितेन्दीवरमालभारिणी विकसितनीलोत्पलमालभारिणीवेत्युप्रेक्षा । व्यरुचध्यरोचिष्ट । `धुन्यो लुङि` (१॥३।९१) इति विकल्पात्परस्मैपदम्
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कृ | त | म | ण्ड | ल | ब | न्ध | मु | ल्ल | स | द्भिः | |
| शि | र | सि | प्र | त्यु | र | सं | वि | ल | म्ब | मा | नैः |
| व्य | रु | च | ज्ज | न | ता | भु | ज | ङ्ग | भो | गै | |
| र्द | लि | ते | न्दी | व | र | मा | ल | भा | रि | णी | व |
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