व्यवहार इवानृताभियोगं
तिमिरं निर्जितवत्यथप्रकाशे ।
रिपुरुल्बणभीमभोगभाजां
भुजगानां जननीं जजाप विद्याम् ॥
व्यवहार इवानृताभियोगं
तिमिरं निर्जितवत्यथप्रकाशे ।
रिपुरुल्बणभीमभोगभाजां
भुजगानां जननीं जजाप विद्याम् ॥
तिमिरं निर्जितवत्यथप्रकाशे ।
रिपुरुल्बणभीमभोगभाजां
भुजगानां जननीं जजाप विद्याम् ॥
मल्लिनाथः
व्यवहार इति ॥ व्यवहारे न्यायवादे अनृताभियोगं मिथ्याभिशंसनमिव प्रकाशे कौस्तुभतेजसि तिमिरं प्रस्वापनान्धकारं निर्जितवति निरस्तवति सति अथैतन्निरसनानन्तरं रिपुश्चैद्य उल्बणान्महतो भीमांश्च भोगान् फणान्, कायांश्च भजन्तीति तद्भाजः । `भोगः सुखे रुयादिभृतावहेश्च फणकाययोः` इत्यमरः । भुजगानां जननीमुत्पादिकां विद्यां मनं जजाप जपति स्म । भुजगास्त्रमाजहारेत्यर्थः । उल्बणेत्यत्र क्वचित् `उत्फण-` इति पाठः । उपमालंकारः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | व | हा | र | इ | वा | नृ | ता | भि | यो | गं | |
| ति | मि | रं | नि | र्जि | त | व | त्य | थ | प्र | का | शे |
| रि | पु | रु | ल्ब | ण | भी | म | भो | ग | भा | जां | |
| भु | ज | गा | नां | ज | न | नीं | ज | जा | प | वि | द्याम् |
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