प्रकृतिं प्रतिपादुकैश्च पादै-
श्चकॢषे भानुमतः पुनः प्रसर्तुम् ।
तमसोऽभिभवादपास्य मूर्च्छा-
मुपजीवत्सहसैव जीवलोकः ॥
प्रकृतिं प्रतिपादुकैश्च पादै-
श्चकॢषे भानुमतः पुनः प्रसर्तुम् ।
तमसोऽभिभवादपास्य मूर्च्छा-
मुपजीवत्सहसैव जीवलोकः ॥
श्चकॢषे भानुमतः पुनः प्रसर्तुम् ।
तमसोऽभिभवादपास्य मूर्च्छा-
मुपजीवत्सहसैव जीवलोकः ॥
मल्लिनाथः
प्रकृतिमिति ॥ प्रकृतिं स्वभावं प्रतिपादुकैः प्रतिपद्यमानैः । `लषपतपद-` (अष्टाध्यायी ३.२.१५४ ) इत्यादिना उकन्प्रत्ययः । `न लोका-` (अष्टाध्यायी २.३.६९ ) इत्यादिना षष्ठीप्रतिषेधः । भानुमतोंऽशुमतः पादै रश्मिभिश्च पुनर्भूयः प्रसर्तुं चक्लुपे शेके । `क्लपू सामर्थे` भावे लिट् `कृपो रो लः` (अष्टाध्यायी ८.२.१८ ) इति ऋकारस्थस्यापि रेफस्य लकारः । जीवलोकः प्राणिवर्गश्च तमसोऽन्धकारस्याभिभवात् । अभिभूतत्वादित्यर्थः । `कर्तृकर्मणोः कृति` (अष्टाध्यायी २.३.६५ ) इति कर्मणि षष्ठी । सहसैव मूर्च्छामपास्य उदजीवदुदश्वसीत् । अत्रीजीवनस्यार्ककरप्रसारहेतुकत्वाद्वाक्यार्थहेतुकं काव्यलिङ्गम्
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | कृ | तिं | प्र | ति | पा | दु | कै | श्च | पा | दै | |
| श्च | कॢ | षे | भा | नु | म | तः | पु | नः | प्र | स | र्तुम् |
| त | म | सो | ऽभि | भ | वा | द | पा | स्य | मू | र्च्छा | |
| मु | प | जी | व | त्स | ह | सै | व | जी | व | लो | कः |
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