गुरवोऽपि निषद्य यन्निदद्रु-
र्धनुषि क्ष्मापतयो न वाच्यमेतत् ।
क्षयितापदि जाग्रतोऽपि नित्यं
ननु तत्रैव हि तेऽभवन्निषण्णाः ॥
गुरवोऽपि निषद्य यन्निदद्रु-
र्धनुषि क्ष्मापतयो न वाच्यमेतत् ।
क्षयितापदि जाग्रतोऽपि नित्यं
ननु तत्रैव हि तेऽभवन्निषण्णाः ॥
र्धनुषि क्ष्मापतयो न वाच्यमेतत् ।
क्षयितापदि जाग्रतोऽपि नित्यं
ननु तत्रैव हि तेऽभवन्निषण्णाः ॥
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गु | र | वो | ऽपि | नि | ष | द्य | य | न्नि | द | द्रु | |
| र्ध | नु | षि | क्ष्मा | प | त | यो | न | वा | च्य | मे | तत् |
| क्ष | यि | ता | प | दि | जा | ग्र | तो | ऽपि | नि | त्यं | |
| न | नु | त | त्रै | व | हि | ते | ऽभ | व | न्नि | ष | ण्णाः |
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