शितचक्रनिपातसंप्रतीक्ष्यं
वहतः स्कन्धगतं च तस्य मृत्युम् ।
अभिशौरि रथोऽथनोदिताश्वः
प्रययौ सारथिरूपया नियत्या ॥
शितचक्रनिपातसंप्रतीक्ष्यं
वहतः स्कन्धगतं च तस्य मृत्युम् ।
अभिशौरि रथोऽथनोदिताश्वः
प्रययौ सारथिरूपया नियत्या ॥
वहतः स्कन्धगतं च तस्य मृत्युम् ।
अभिशौरि रथोऽथनोदिताश्वः
प्रययौ सारथिरूपया नियत्या ॥
मल्लिनाथः
शितेति ॥ अथ आह्वानानन्तरं शितचक्रनिपातं शितसुदर्शनप्रहारं संप्रतीक्षत इति शितचक्रनिपातसंप्रतीक्षम् । ईक्षतेः कर्मण्यण् । स्कन्धगतं मृत्युं वहतः तस्य चैद्यस्य रथः सारथिरूपया नियत्या विधिनेति रूपकम् । `भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः` इत्यमरः । नोदिताश्वः प्रेरिताश्वः सन् अभिशौरि शौरिमभि । आभिमुख्येऽव्ययीभावः । `अव्ययादाप्सुपः` (अष्टाध्यायी २.४.८२ ) इति सुपो लुक् । प्रययौ प्रतस्थे
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| शि | त | च | क्र | नि | पा | त | सं | प्र | ती | क्ष्यं | |
| व | ह | तः | स्क | न्ध | ग | तं | च | त | स्य | मृ | त्युम् |
| अ | भि | शौ | रि | र | थो | ऽथ | नो | दि | ता | श्वः | |
| प्र | य | यौ | सा | र | थि | रू | प | या | नि | य | त्या |
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