अभिचैद्यमगाद्रथोऽपि शौरे-
रवनिं जागुडकुङ्कुमाभिताम्रैः ।
गुरनेमिनिपीडनावदीर्ण-
व्यसुदेहस्रुतशोणितैर्विलिम्पन् ॥
अभिचैद्यमगाद्रथोऽपि शौरे-
रवनिं जागुडकुङ्कुमाभिताम्रैः ।
गुरनेमिनिपीडनावदीर्ण-
व्यसुदेहस्रुतशोणितैर्विलिम्पन् ॥
रवनिं जागुडकुङ्कुमाभिताम्रैः ।
गुरनेमिनिपीडनावदीर्ण-
व्यसुदेहस्रुतशोणितैर्विलिम्पन् ॥
मल्लिनाथः
अभीति ॥ अथ शौरेः कृष्णस्य रथोऽपि जागुडो देशविशेषः, तत्र यत्कुङ्कुमं तद्वदभिताम्रररुणैरित्युपमा । यावकेति पाठे यावकश्च कुङ्कुमं च ताभ्यामभिताम्ररित्यर्थः । गुरूणां नेमीनां चक्रधाराणां निपीडनेन नोदनेनावदीर्णेभ्यो व्यसूनां विगतप्राणानां देहेभ्यः स्रुतैः शोणितैरसृम्भिरवनिं विलिम्पन्नुपदिहानः सन् अभिचैद्यं चैद्यमभि । समासो व्यासो वा विकल्पात् अगात् । `इणो गा लुङि` (२०४५) इति गादेशः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | चै | द्य | म | गा | द्र | थो | ऽपि | शौ | रे | |
| र | व | निं | जा | गु | ड | कु | ङ्कु | मा | भि | ता | म्रैः |
| गु | र | ने | मि | नि | पी | ड | ना | व | दी | र्ण | |
| व्य | सु | दे | ह | स्रु | त | शो | णि | तै | र्वि | लि | म्पन् |
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